
साल 2006 के निठारी सीरियल किलिंग केस में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने दोषी सुरेंद्र कोली को रिंपा हल्दर मर्डर केस में उम्रकैद की सजा से बरी कर दिया है।
बेंच ने आदेश दिया कि — “अगर कोली किसी और केस में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।”
यह फैसला 7 अक्टूबर को सुरक्षित रखा गया था, जिसे 3 जजों CJI बीआरगवई, जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने आज सुनाया।
कोली पहले ही 12 मामलों में हो चुका था बरी
सुरेंद्र कोली अब तक 12 मामलों में बरी हो चुका था, लेकिन रिंपा हल्दर मर्डर केस में उसे उम्रकैद की सजा मिली हुई थी।
वह गाजियाबाद जेल में 19 साल से बंद था। अब कोर्ट के आदेश के बाद, वह इस केस में भी आज़ाद हो जाएगा।
बेंच की अहम टिप्पणियां — “रसोई के चाकू से हड्डी नहीं कट सकती”
सुनवाई के दौरान बेंच ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
CJI ने कहा — “जब आरोपी 12 मामलों में बरी हो चुका है, तो एक केस में सजा देना मजाक जैसा होगा।” वहीं, जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा — “रसोई के चाकू से हड्डियों को काटना संभव नहीं है।”
कोर्ट ने माना कि सबूतों में कई विसंगतियां थीं, और जांच में कई गंभीर त्रुटियां की गईं।
क्यूरेटिव पिटीशन से बदली किस्मत
सुरेंद्र कोली ने पहले पुनर्विचार याचिका दायर की थी, जो खारिज हो गई थी। इसके बाद उसने क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल कर सजा को चुनौती दी।
अब उसी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2011 का फैसला रद्द कर दिया है।
“इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द, सभी सजा रद्द, याचिकाकर्ता बरी।”
क्या था निठारी कांड?
साल 2005-06, नोएडा के निठारी गांव से 19 बच्चों और महिलाओं के लापता होने की खबरें आईं। बाद में पुलिस ने मोनिंदर सिंह पंधेर के घर से 8 बच्चों के कंकाल बरामद किए। घटनास्थल पर मिली हड्डियों और कपड़ों से सीरियल किलिंग का सनसनीखेज खुलासा हुआ।
आरोप था कि कोली ने बच्चों के साथ रेप, हत्या और नरभक्षण तक किया। हालांकि, कोली ने कहा कि उसने ये कबूलनामे दबाव में दिए थे।
नार्को टेस्ट में उसने 6 बच्चों और एक महिला की हत्या स्वीकार की थी।
मोनिंदर सिंह पंधेर भी पहले ही बरी
इस केस के दूसरे आरोपी मोनिंदर सिंह पंधेर को भी पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरी कर दिया था। अब दोनों ही आरोपियों को कानूनी रूप से क्लीन चिट मिल गई है।
केस ने भारत की जांच प्रणाली पर उठाए सवाल
निठारी कांड उस दौर में देश की सबसे डरावनी क्राइम स्टोरी बन गया था। अब सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता बल्कि फॉरेंसिक जांच के तरीकों पर भी गंभीर सवाल उठाता है।
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